दुनियां भर के तनाव जब जिंदगी को थका रहे हैं,

तो आओ …….

क्यों ना, ज़िंदगी से हाथ मिलाकर हम भी कुछ देर मुस्कुरा ले …….

Tuesday, March 18, 2025

रिटायरमेंट स्पीच


रिटायरमेंट स्पीच 

रिटायरमेंट... यानि अंतिम दिन... यानि अब विदा लेने का समय आ गया... यानि एक यात्रा का अंतिम दिन और अंतिम विदा की तैयारी|
 
आज, मेरे जीवन के उत्तरार्ध में मेरे शेष जीवन का प्रथम दिन है... यह स्वर्णिम है... 
बीते जीवन को मैंने पूरी आत्मीयता, समर्पण और पूरी तरह से खुल कर जिया है-- किसी की शर्तों पर नहीं, अपने स्वयं के सिद्धांतों, जीवन मूल्यों, आत्मसम्मान और गर्व के साथ जिया है... भरपूर जिया है!
 
जीवन शर्तों पर नहीं जिया जाता... जीवन में जीवन्तता, उमंग और सार्थकता का होना बहुत आवश्यक है! 

जब कभी हम अपने जीवन की कहानी (जीवन-गाथा) लिखेंगे, उसमें कुछ ऐसे नाम होंगे, जिनसे जाने-अनजाने में हमारे रिश्तों की डोर बंध गई... 
जिन्होंने हमें जीवन के मूल्यों, संस्कारों और आत्मसम्मान से जीने का पाठ पढ़ाया... जो हमारी मुस्कान की वजह बनें... 
कभी किसी पड़ाव/मोड़ पर हमें कुछ खट्टे-मिट्ठे, अच्छे-बुरे अनुभव हुए... 
हमे किसी ने हँसाया, किसी ने रुलाया, किसी ने गिराया... और किसी ने संभाला भी... 
इन्हीं अनुभवों के साथ हम जीवन के सफर में आगे बढ़ते चले गए... 

और फिर... अब आगे कोई एक “अंतिम दिन” ऐसा भी आएगा-- जो हमारी रिटायरमेंट का होगा...
वह अंतिम घड़ी जब हमारी जीवन-पटकथा का अंतिम दृश्य लिखा जाएगा...  
और मजे की बात ये होगी... 
उस दिन हम खुद अपनी “रिटायरमेंट स्पीच” नहीं दे पाएंगे, हमारे पूरे जीवन की पटकथा ही हमारी रिटायरमेंट स्पीच होगी |

तो क्यों न हम आज ही अपनी उस रिटायरमेंट स्पीच की रूपरेखा स्वयं ही  रच लें? 
जिन पलों को हमें अभी जीना शेष है, उन्हें हमें स्वयं ही गढ़ना है, स्वयं ही लिखना है... 
गजब है भई यह तो !! यह कमाल की बात है-- जब हमारे जीवन की पटकथा हमारे ही हाथ में है, तो क्यों न हम इसे सबसे सुंदर, सबसे सार्थक लिखें... 

हाँ... यह आसान नहीं... एक चुनौती की तरह हो सकता है...  
यहाँ हमारा अनुभव हमें दिशा दिखलाएगा... इसलिए, हमारे पास अपने बारे में कहने-सुनने के लिए कुछ (या बहुत कुछ?) तो होना ही चाहिये ! 
हम सभी मानते है की यह संसार एक रंगमंच है, और हम सब कलाकार इस रंगमंच पर  एक नाटक के रूप में ये जो अपना जीवन जी रहे है... 
इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाला तो कोई और ही है... पर क्या वाकई हमारी स्क्रिप्ट किसी और ने लिखी है ? 
अगर ऐसा है... तो फिर हमें अपनी भूमिका कैसे निभानी है, इसकी कोई स्क्रिप्ट हमें क्यों नहीं मिली? 

दरअसल, हमें अपना पात्र कैसे निभाना है यह तो हम स्वयं ही तय कर रहे है... 
जब हमे ही सब तय करना है, तो क्यों ना इस रंगमंच पर अपनी भूमिका को प्रभावी, गरिमामय बनाकर एक अच्छा स्वरूप प्रदान करें... 
जिससे हमारी अदाकारी प्रेरक एवं आत्मविश्वास से भरपूर हो...  
और, जब हम अपनी कहानी/पटकथा खुद लिखेंगे... तो उसमें सुंदरता, प्रेम और अपने सपने भरेंगे... 

पर तनिक ठहरिए... 
जो जीवन बीत गया उस पर एक नज़र डाल लेते है.. 
कहीं ऐसा तो नहीं की हमारा जीवन केवल कुछ घटनाओं, कुछ तारीखों का संग्रह ही बन कर रह गया हो ? 
या फिर संघर्ष और आपाधापी के बीच यह जीवन जीते जीते हम स्वयं को ही न खो बैठे हो? 
क्या हम कभी उन्मुक्त होकर, स्वयं के लिए जी पाए है? 

याद रखें... सफल लोग अपना भविष्य/जीवन स्वयं अपने पुरुषार्थ से रचते है... 
वे कड़ा संघर्ष कर अपनी हस्तरेखाओं का निर्माण स्वयं करते है...
वहीं, कुछ लोग यह समझ ही नहीं पाते की वास्तव में वे अपने जीवन में हासिल क्या करना चाहते है? 
उनके जीवन का लक्ष्य क्या है? 

क्या हम अपने जीवन जी पटकथा लिखते समय यह स्पष्टता से लिख पाएंगे की वास्तव में हम चाहते क्या है ? 
हमे किसी को चमत्कृत नहीं करना है... 
पर हमारे जीवन में हमारे पास इतना तो हो जो हमारी "रिटायर्मेंट स्पीच" को सुन्दर, सार्थक और प्रेरक बना सकें...
 
हमने किससे क्या सीखा --- उनके प्रति आभार... 
हमसे जाने-अनजाने जो भूल या गलतियाँ हुई --- उनके प्रति खेद... 
यह हमारी जीवन गाथा का हिस्सा होना ही चाहिए... 

और सबसे जरूरी --- हमारी स्वयं की पहचान, हमारा खुद का स्थान...
अपनी ही कहानी में खुद के लिए एक सशक्त एवं सुगंधित स्थान अवश्य बनायें, यह नहीं की हमारा खुद का कोई जीवन नहीं... 
हम तो अपना जीवन जी चुके अब तो केवल परिवारिक जिम्मेवारियां ही निभानी है ... 
नहीं! 
अपनी कहानी में अपने सपने भी लिखिए...
तभी तो जीवन को सही दिशा और लक्ष्य मिलेगा...
आखिरकार, हमारे उन सपनों में हमारा परिवार तो शामिल है ही...
पर, हमारे परिवार में हमारे सपनों के लिए भी जगह होनी चाहिए...
हमारा व्यक्तिगत जीवन भी तो मायने रखता है... 
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारा यह जीवन भी महत्वपूर्ण है.. अनमोल है...

इस जीवन में बहुत कुछ ऐसा होगा, जो हमारी पसंद का नहीं होगा, हमारे अनुकूल नहीं होगा...
और जिसे बदल पाना भी हमारे लिए संभव नहीं होगा...क्योंकि बहुत कुछ तो नियति पर भी निर्भर है...
तो, जो आप बदल सकते हैं, जो कर सकते है... और आपकी पसंद के वे बहुत सारे कार्य जो आप कर सकते है--- जरूर करें...

हमारे जीवन में आने के लिए खुशियाँ हमेशा हमारे दरवाज़े के बाहर खड़ी रहती है...  कृपया दरवाज़ा खोले और उन्हें  भीतर आने दें...  
हमें बेहतर मालूम होना चाहिए की हम  किन किन बातों में अच्छे है... और क्या क्या बेहतरीन कर सकते है...  

“इत्र से कपड़ों का महकना कोई बड़ी बात नहीं, मज़ा तो तब है, जब आपके किरदार से खुशबू आए...”
 
तो आइए... 
हम अपना श्रेष्ठतम दें... 
अपनी जीवन गाथा ऐसी लिखे... 
कि जीवन के रंगमंच पर जब हमारा नाटक समाप्त हो... 
तो, उस क्षण दर्शक कहें --- “ इस पात्र का जीवन सार्थक और प्रेरक था ...” 
उस समय किसी औपचारिक विदाई की आवश्यकता नहीं होगी ..  
और हमारी रिटायरमेंट स्पीच -- एक सुंदर और प्रेरक रचना बन जाएगी.. 
और क्यों न बने...! इस जीवन के बाद, इस नाटक के बाद... दर्शकों की तालियाँ  भी तो जोरदार मिलनी चाहिए .. मिलनी चाहिए या नहीं... ? 

एक विचारक, 
 प्रमोद जैन, भोपाल
9691916053

Thursday, January 19, 2012

बस एक कलाई और एक डोर !
किसी शब्द की जरुरत नहीं, किसी संवाद की आवश्यकता नहीं !
सिर्फ एक कच्चा धागा, भाई-बहन के प्यार का अटूट बंधन !
क्या, इतना सीधा और सरल हो सकता है कुछ और ?
अहा ! लो आ ही गया !! चिर-प्रतीक्षित, स्नेह का प्रतिक, ये सुमंगल पर्व रक्षा-बंधन !
सावन की मीठी-मधुर रिमझिम फुहारों के साथ आता है स्नेह के धागों का यह मौसम, भाई-बहन के अटूट संबंध, प्यार और खुशियों का मौसम ! एक ऐसी अटूट परंपरा का मौसम जिसने सदियों से हमारे देश में भाई-बहन के रिश्ते को स्नेह और कर्तव्य के कोमल धागों में पिरोया हुआ है ! जहां भावो की विद्युत तरगें भू-मण्डलीय वायु से प्राणवायु में प्रवाहित हो सदा आनंन्दोलित करती हों, वहाँ भावो को प्रकट करने हेतु शब्दों के लियें कोई स्थान नहीं ! ये रक्षा-सूत्र सदा भावनाओं में ऊष्मा के स्तर को बढ़ा देते हैं और इनके कलाई पर बंधते ही प्राप्त होता है, आत्म तृप्ति का एक ऐसा अनुभव जो अमृततुल्य हैं ! कोई आँख से देख नहीं सकता इस जज्बें को क्योकिं यह तो एक एहसास हैं, कोई अंदाज नहीं !
अनमोल स्नेहाशिर्वाद की मृदुल ज्योत्सना से परिपूर्ण एवं विश्वास की प्रतिक है यह राखीं ! खुद ही विचार कर के देखें की आधुनिकता के एस दौर में, परिवार के ही भाई-बहन को “कजिन” कहने वालों में क्या ये रेश्मीं धागें कभी ममेरें-चचेरे हो पाते हैं ! दिल की अनंत गहराइयों, को छु जाने वाला त्यौहार हैं राखीं, जब आती है राखीं, तो, आँख है भर आती ! यह राखी का रिश्ता समय से साथ बदलता नहीं बल्कि और गहराता जाता हैं ! यह परम्पराओं और अंधविश्वास की रुढियों से कहीं ऊपर उठ कर हैं ! हर परिभाषा से परे है ये मधुर संबंध, जो अत्यंत ही उत्साहवर्धक हैं ! यह भी शाश्वत सत्य हैं कि ऐसे सबंधों से व्यक्ति के गुण बाहर आते हैं, मन की परेशानियां दूर होती हैं एवं हमारे जीवन में जीवंतता वापिस आती हैं ! उत्साह बढ़ने से न केवल स्वस्थ संबंधों की बुनियाद पड़ती है बल्कि हम सफलता की उचाईयों को भी छूते हैं !
जिस प्रकार सूरज से अच्छा सितारा कोई और नहीं, उसी प्रकार पूरी कायनात में इस रिश्तें सा प्यारा रिश्ता भी कोई और नहीं ! एक डोर वाले इस त्यौहार के मायने महज रस्मी नहीं हैं, कितने ही भाई हन ऐसे होंगें जो पूरे साल इस धागें को अपनी कलाई से अलग नहीं होने देतें और बहनों का तो कहना ही क्या, जब तक भाई की कलाई को रेश्म की डोर से ना सजा ले अपना मुहँ झूठा नहीं करती ! भाई-बहन का यह संबंध जितना अनूठा है उससे भी अधिक अद्भुत है उसकी भावना ! इसके अभाव की पीड़ा तो वहीँ महसूस कर सकते हैं, जिनकी कलाई में स्नेह का यह बंधन बांधने वाला कोई नहीं हैं या जिसके पास ऐसी कोई कलाई नहीं ! खुशनसीब हैं वे लोग जिन्हें मिला हैं यह अनमोल गहना, इसे कभी अलविदा न कहना !

इन रेश्मीं धागों से प्राप्त संबल, अनुभवगम्य !!
एक सुखद एवं सौम्य अनुभूति, एक अनमोल सौगात !!!
सभी भई-बहनों को इस सुमांगलिक पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें !
मै अपनी समझ से सबसे अच्छा करने और अपनी क्षमता के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता हूँ, सफल भी होता हूँ ! इसलिए मेरी आलोचना करने वाले ना अपना समय व्यर्थ करें और ना ही कुंठित हों, मेरे लिये उस आलोचना का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता !

Monday, September 27, 2010

संवाद, जिंदगी जीने की एक कला है, इसका प्रभाव प्रत्यक्ष एवं सीधा होता है ! एक बेहतरीन विकल्प के रूप में यह दवा से भी बेहतर कारगर और ज़हर से भी खतरनाक हो सकता है ! अत: इसके इसके लिए अभ्यास एवं जागरूकता की नितांत आवश्यकता है !

रिश्तो की गरिमा बनाये रखने के लिये परस्पर संवाद बने रहना नितांत आवश्यक है | संबंधो मे संवादहीनता कभी ना आने दे | आपसी संवाद मन का गुबार निकाल देते है और कटुता अपने आप मिट जाती है | संवाद के शब्दों मे एक ऐसी शक्ति छिपी होती है जो अहसास एवं भावनाओ को प्रदर्शित कर क्षमा और शर्मिंदगी का भाव जाहिर कर देती है, तभी हमे रिश्तो कि गरिमा का एहसास होता है | बातो को तूल देना अपना ही तनाव बढाना है, रिश्तो को कड़वाहट पर खत्म कर देने से बेहतर है, संवाद की ओपचारिकता का ही पालन करते रहें | परस्पर संवाद विवाद खत्म करने और फिर से नयी शुरुआत करने का एक बेहतरीन तरीका है | किसी से रिश्ते इतने ना बिगाड की उनमे परस्पर बातचीत की कोई गुंजाइश ही बाकि ना बचें |

उपरोक्त कहने का तात्पर्य यह है कि - संवाद की सम्भावना को कभी खत्म ना होने दे वर्ना धीरे धीरे रिश्तो मे दुरिया बढती जाएँगी | संबंधो मे प्यार ना सही, उस प्यार एहसास तो बने ही रहने देना चाहिये |

संवाद न कर पाना आपको निर्जीव बना सकता है | संवाद मानसिक सेहत के लिये तो अच्छा है ही, साथ ही साथ प्यार और अपनेपन की ये बाते आपकी ज़िन्दगी मे उर्जा का एक ऐसा जादुई संचार कर देती है, इस के करण उन भावनाओ की बागडोर आप के हाथो मे आ जाती है जो आपको एक नकारात्मक सोच की ओर ले जा रही होती है ! इससे आप अपनी संवेदनाओ पर बेहतर नियंत्रण रख पाते है | यही स्थिति रिश्तो मे घनिष्टता और संतुष्टि बढाती है | अपनी संवेदनाओ को जाहिर करना और दुसरो की सुनना भावनात्मक रूप से सेहतमंद और बेहतर होता है |

संवाद एक सामाजिक जुडाव की परिक्रिया भी है जो एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे और धीरे धीरे एक समूह को आपस मे जोड़ देती है | चाहे बात किसी गहन मुद्दे का विश्लेषण हो या अन्य कोई छोटी सी बात | परस्पर समूह मे संवाद की निरंतरता आपके सामाजिक प्रदर्शन को प्रखर करती है वह आपके प्रभाव को तो बढाती ही है वरन आपकी मानसिक निपूर्णताओ मे भी बढोतरी करती है | सामाजिक होना और बात करना दिमाग के लिये व्यायाम का काम करता है | संवाद अपनी प्रतिक्रिया देना और दुसरे से जुड़ने का एक ससक्त माध्यम है | आत्मीयता, स्नेह, निष्पक्षता और गंभीरता से जुडा संवाद व्यक्तित्व मे सुधार और आत्मविश्वास मे बढोतरी लाता है | संवाद स्वाभिमान को मजबूत बनाने और आपको अच्छा महसूस करवाने का काम करता है |

तो मित्रों, आओ ... संवाद के माध्यम से अपनों से अपने टूटे तारों को फिर से जोड़ें ले .

Sunday, August 1, 2010

एक प्रश्न उठा - क्या, मोक्ष केवल जैन ही जाते है ?

नहीं, ऐसा नहीं है बल्कि जो मोक्ष जाते है केवल और केवल वही जैन होते है | जैन संस्कृति उस चर्या का नाम है, जिसमे साधक को अपने विकारों, कषायों को जितना पड़ता है | व्यक्ति जाति अथवा धर्म से नहीं अपितु अपने आचरण एवं व्यव्हार से जैन कहलाता है |

महावीर की संस्कृति को श्रमण-संस्कृति कहा गया है, जिसका अर्थ है, जो भी मिलेगा श्रम से मिलेगा, जहां भी पहुंचोगे श्रम से पहुंचोगे | महावीर प्रार्थना से नहीं, प्रयत्न से मिलेंगे | परमात्मा पूजा से नहीं, पुरुषार्थ से मिलेंगें | अकेली प्रार्थना अधूरी है, प्रार्थना के साथ प्रयत्न भी अनिवार्य है | मोक्ष प्रसाद में नहीं, प्रयास से मिलेगा, याचना से नहीं, यत्न से मिलेगा | मोह की मौत ही मोक्ष का मूल्य है, मोक्ष के लिए यह मूल्य अनिवार्य रूप से चुकाना पड़ेगा | मोक्ष विरासत में या उतराधिकार में मिलने वाली संपत्ति नहीं है, उसे तो खुद ही अर्जित करना पड़ता है |

विकारों, विकृतियों, वासनाओं तथा कामनाओं से मुक्ति ही तो मोक्ष है | इस्लाम धर्म को मानने वाले मुहम्मद साहब की इबादत करते हैं | मुहम्मद का अर्थ भी वहीँ होता है जो जिनेन्द्र का होता है | मोह+मद अर्थात “मुहम्मद” | जो मोह और मद का मर्दन कर देता है, वही तो मुहम्मद होता है | सनातन धर्म को मानने वाले मोहन और मदन की पूजा करते है, उनका अर्थ भी वहीँ होता है, जो जिनेन्द्र का होता है | मोह-न (मोहन), मद-न (मदन) अर्थात जिसमे मोह नहीं वह “मोहन” है, जिसमे मद नहीं वह “मदन” है |

राम किसे कहें ? जो स्वयं में राम रहा है, वह “राम” है| जो कहे खुद में आ वह “खुदा” है | अल्लाह किसे कहें ? जो आली से आली हो वह “अल्लाह” हैं | रहीम किसे कहें ? जो सब पर रहम करें, वो “रहीम” हैं | बुद्ध किसे कहें ? जो परमबोधि को उपलब्ध हो गया, वह “बुद्ध” हैं | ईसाई किसे कहें ? जो ईश्वर का हो, वह “ईसाई” हैं | वैष्णव किसे कहें ? जो वैर का नाश करें, वह “वैष्णव” हैं | पारसी किसे कहें ? जो संसार के पार देखता है, वह “पारसी” हैं | सिक्ख किसे कहें ? जो शिष्य बनने को राजी हो, वह “सिक्ख” हैं| शब्द बड़े सार्थक होते है, शब्द बोलते है | इसीलिए शब्दों को ब्रह्म कहा गया हैं | शब्दों के सत्य को अगर इंसान समझ ले तो आज धर्म के नाम पर जो हाहाकार विश्व में मचा हुआ हैं, उस पर विराम लग जाएँ |

तो, मित्रों आओ शब्दों के मर्म को समझे और अपने नाम को सार्थक करें .....

Monday, July 26, 2010

बनें अपनी कंपनी कि जरुरत !

ये सदा स्मरण रखें कि आपकी कंपनी में आपकी अहमियत तभी हैं, जब आप उसकी जरुरत हों | बेशक आप बेहद प्रतिभाशाली है आपमे असीम क्षमताएं हैं, वहीँ अगर आप दूसरों के सामने उनका सही प्रस्तुतीकरण, उनकी सही मार्केटिंग करने में अक्षम हैं, तो आप अपनी उस कंपनी में सब से अयोग्य व्यक्ति हैं, आप सफलता का विचार अपने दिमाग से निकल दें | आज उपभोक्तावादी संस्कृति में हर जगह ब्रांड को अहमियत दी जाने लगी हैं | फिर चाहे ब्रांड का यह टैग खाने-पीने, पहनने की वस्तुओं पर लगा हो या फिर इंसान के साथ जुड़ा हो |

समय हमे खुद को एक “ब्रांड” के रूप में विकसित कर लेने के लिए चेता रहा हैं | जो इस तथ्य को नकारते हैं, वें भी इस व्यूह रचना का हिस्सा हैं | और इस बात को वे जितना जल्द से जल्द समझ लें, ये उनके भविष्य के लिए उतना ही अच्छा हैं | कहने-सुनने में भले ही ये यह अजीब लगे, लेकिन आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर से लेकर आपके यहाँ आने वाला एक डाकिया, छोटी सी दुकान चलाने वाला एक पनवाड़ी, एक नाई तक “ब्रांड” हैं |

आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में अगर सफल होना हैं तो आपको अपनी एक खास पहचान बनानी होगी, अपना एक अलग व्यक्तिव गड़ना होगा जो आपको भीड़ से अलग दिखलायें | यानि जीवन में सफलता पाने के लिए आपको भी एक “ब्रांड” बनना ही होगा | अगर आप लिक से हट कर खुद को साबित नहीं करते है तो आपके असफल होने के अवसर सफल होने कि तुलना में कई गुना बढ़ जाते हैं | इसके बनिबस्त अगर आप खुद को एक “ब्रांड” के रूप में विकसित कर लेते है तो, बेहतर से बेहतर अवसर आपके दरवाजे तो खड़े होंगें ही बल्कि आप खुद को सेलेब्रिटी की श्रेणी में भी पहुंचा सकेंगें | जैसे किसी ब्रांड या उत्पाद को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रचार निति भी बनायीं जाती हैं, ठीक उसी प्रकार आपको भी खुद को लोकप्रिय, प्रसिद्ध करने के लिए मार्केटिंग के तरीकों को अपनाना होगा | ये तो जग जाहिर है - जो दीखता हैं, वहीँ बिकता है |

हम जब भी किसी व्यक्ति से मिलते है तो उस पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं | हमारे व्यक्तित्व का अन्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता हैं, उसकी नजरो में हमारी एक छवि विकसित होती हैं, या आप इसे यूँ कहिएँ कि तब हमारी एक “ब्रांड-वैल्यू” निर्धारित होती हैं | जैसे जैसे लोग आप को पसंद करते जाते है, एक ब्रांड के रूप में आपकी लोकप्रियता उतनी ही बढती जाती है यानि जीवन में आपकी सफलता के अवसर बढते जाते हैं |

फिर क्या सोचा हैं ?

Sunday, July 25, 2010

जीवन में गुरु कि नितांत आवश्यकता !

गुरु भारतीय-संस्कृति कि खोज है, पश्चिम भाषाओ में तो गुरु शब्द ही नहीं था | गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय सनातन परम्परा है | अध्यात्म प्रधान भारत देश में देव गुरु-धर्म का विशेष महत्व हैं | गुरु शब्द ब्रह्म रूप है | गुरु दहलीज के उस दीपक कि भांति है जो हमे भीतर के सच्चिदानंद स्वरूपी देवतत्व से जुड़ने के लिए धर्म मार्ग पर चलना सिखाते हैं, गुरु ही हमे देव और धर्म से जोड़ सकते हैं | "गु" यानि "गुण" और "रु" यानि "रूचि" | जो गुणों में रूचि जगाएं और दोषों से दूर भगाएं, वो गुरु ही होते है | जैसे किसी जलते हुए दीपक को देख कर बुझे हुए दीपक को ज्योतिबोध हो जाता है और वह भी प्रज्वलित हो उठता है, जैसे विस्तृत आकाश को देख कर भीतर का आकाश साकार हो उठता है | वैसे ही सदगुरु का प्रत्यक्ष दर्शन हमे स्वबोध करवाता हैं |

हमें जीवन में गुरु अवश्य बनाना चाहिए, चाहे वह माटी की मूर्ति ही क्यों ना हो | एकलव्य ने द्रोणाचार्य को गुरु मानकर, उनकी मूर्ति के सामने ही धनुर्विद्या सिखनी प्रारंभ की और एक दिन वे अर्जुन से भी अधिक प्रतिभाशाली बन गयें | अँधेरा चाहे कितना ही गहरा और पुराना क्यों ना हों, उसे दूर करने के लिए एक छोटा सा चिराग ही काफी है | बिज चाहें कितना ही छोटा क्यों ना हों, अंकुरित होने पर वही विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेता हैं | किसी को छोटा समझ कर उसकी उपेक्षा कभी ना करें | लघुवय में अष्टावक्र जी ने राजा जनक को आत्मबोध करवा दिया था | ज्ञानी गुरु ही शिष्य के अन्तहृदय में ज्ञान कि ज्योति को प्रज्वलित कर सकते है | " पानी पीजिए छानकर, गुरु कीजिये जानकर |" - हमे गुरु बनाना चाहिए, किन्तु गुरु आत्मज्ञानी, निष्पक्ष, विशिष्ट व श्रुतज्ञानी होना चाहियें | आज चंहुओर नामधारी और वेशधारी गुरुओं की भरमार हैं, किंतु सच्चे आत्मज्ञानी के दर्शन दुर्लभ हो गये है | सच्चा गुरु तो वही है, जिसके वचन शिष्य के भीतर की ग्रंथियों और जन्म-जन्म से पड़ी गांठों को खोल दें |

एक रोचक प्रसंग है - एक सन्यासी ने एक युवक को गुरु का महत्व समझाते हुए अपना शिष्य बना लिया और कहाँ - "अब तुझे मुक्ति मिल जायेगी" यह सुनते ही युवक उठ कर जाने को तत्पर हुआ तो सन्यासी ने कहाँ - "अरे भाई ! कहाँ चले, गुरु दक्षिणा तो देते जाओ " चतुर शिष्य बोला - " अच्छा गुरूजी ठीक है, दक्षिणा में मै आपको दिल्ली देता हूँ" सन्यासी बोला - "क्या दिल्ली तेरे बाप की है ?" युवक ने तपाक से जवाब दिया - "तो क्या मुक्ति आपके बाप की है ?" यह सुन कर सन्यासी मुहँ उतर गया !

तनिक विचार करें, जो अपने शिष्यों से मोटी दक्षिणा पाना चाहतें है क्या वें सच्चे गुरु हो सकते हैं | गुरु तो वो है जो शिष्य के सर्वस्व समर्पण करने पर भी उदासीन एवं निर्लिप्त रहें |

वैसे शिष्य भी कमतर नहीं है, वे गुरु को तो मानते है, किंतु गुरु कि नहीं मानतें | अगर धर्म-गुरुओं की आज्ञा का पालन श्रद्धा से किया जाएँ तो कहीं भी हिंसा और पाखंड का नामोनिशान ना रहें, अन्याय एवं अत्याचार प्रभावी ना हों | गुरु की खोज परमात्मा कि खोज है | गुरु कि खोज वही करता है जिसके भीतर परमात्मा प्राप्ति की प्यास हैं | गुरु से ही हम जीवन निर्माण कि कला सीख सकते है, क्योकि गुरु परमार्थ से जुड़ा रहता है | वे मोक्ष मार्ग के पथप्रदर्शक होते हैं, वे ही मोक्ष का द्वार हैं | गुरु व्यक्त और अव्यक्त रूप से समग्र विश्व में व्याप्त है, वे असहज प्राप्ति को सहज बनाते है !

जय, गुरु देव !